रहति सदाई हरियाई हिय-घायनि में
ऊरध उसास सौ झकोर पुरवा की है ।
पीव-पीव गोपी पीर-पूरित पुकारति है
सोई रतनाकर पुकार पपिहा की है ॥
लागी रहै नैननि सौं नीर की झरी औ
उठै चित मैं चमक सो चमक चपला की है ।
बिनु घनश्याम धाम-धाम ब्रज-मंडल में
उधौ नित बसंति बहार बरसा की है ॥89॥