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राका में / जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

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लिखे रजनी ने जो, उर खोल, विविध नव-नव छंदों में गान,
पंक्तियाँ तारों की बन चमक उठे नभ में जगता द्युतिमान;
शशि-किरणों से धुले जुही की
कलियों के मृदु प्राण,
उमड़ पड़ी कुंजों की कविता,
बन वंशी की तान।
छिटक, छन छिद्र-पथों से, रुद्व कुटीरों के दीपों के प्राण,
मुक्त-नभ-छाया-पथ में चले कौमुदी में करने को स्नान।
कण-कण बना उदार, हुआ उर-
उर का हलका भार,
गिरि-से हृदय कठोर बह गए
बन निर्झर सुकुमार।
चतुर्दिक उत्कंठा उठ पड़ी, प्रेम का उमड़ा पारावार;
खुली नभ के गोपन की गाँठ, चाँदनी में डूबा संसार;
न खोला फिर भी, प्राणाधार,
अभी तक तुमने अपना द्वार!