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राख / शरण कुमार लिंबाले

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प्रिये...
मेरे प्रेम का ख़ून होते समय
कोई भी कवि दुख व्यक्त नहीं करेगा
उनकी क़लम पर लगाम डाल दी गई होगी ।

प्रिये...
दंगे-फ़साद में तुझ पर प्रहार होते समय
पराजित फ़ौज की तरह
मैं भी मज़बूर हो जाऊँगा ।

प्रिये...
हमारी झोपड़ियों को आग लगाने पर
हम जलते रहते हैं
अनाथ और बेवारिस अपने पिता की तरह ही ।

प्रिये...
तू आ घनघोर युद्ध क्षेत्र की तरह
बेकाबू ।

मेरी राख देश के बाहर फेंक देने के लिए
यहाँ के तीर्थक्षेत्र अपवित्र न हों
इसलिए ।

मूल मराठी से सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनूदित