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रातभर मंदिरोॅ में दिया काँपलोॅ गेलै आ / अनिल शंकर झा

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रातभर मंदिरोॅ में दिया काँपलोॅ गेलै आ
रातभर प्यार परवान चढ़लोॅ गेलै।
रातभर प्राण बाँसुरी के बजलोॅ गेलै आ
रातभर दर्द के लहर उठलेॅ गेलै।
रातभरी चकवा आ चकवी बिरह लेनें
जीवन मरण खेल खेललोॅ होलेॅ गलै।
रातभर उश्व बिश्व दुनिया होलोॅ गेलै आ
रातभर विधि ऊपरोॅ सें हमलोॅ गेलै॥