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रात-दिन की बेकली है और मैं हूँ / शिवशंकर मिश्र

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रात-दिन की बेकली है और मैं हूँ
लाश कोई अधजली है और मैं हूँ

सच जो है, जो भी है, जैसा है वही इस
जिंदगी का झूठ भी है और मैं हूँ

मुश्किलें हैं और सब आसानियाँ हैं
एक पुरानी-सी गली है और मैं हूँ

चाहते हैं, राहते हैं, क्या नहीं है
जेब में कुछ मूँगफली है और मैं हूँ

यादें थोड़ी, थोड़े-से गम, थोड़ी खुशियाँ
‘मिशरा’ थोड़ी शायरी है और मैं हूँ