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रात अंधियारी और उसकी झिलमिलाती सी नज़र / विष्णु सक्सेना

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रात अंधियारी और उसकी झिलमिलाती-सी नज़र।
जान ले लेगी ये कातिल मुस्कुराती-सी नज़र।

आज मैंने अपने दिल के साज को छेड़ा ही था।
उठ गई मेरी तरफ इक गुनगुनाती-सी नज़र।

छू लिया हमको जो उसने दिल की धड़कन बढ़ गयी।
कुछ न कर पायी हमारी कंपकंपाती-सी नज़र।

हमने माना गर्मियों की रात तो कट जायेगी,
सर्दियों में टीस देगी सरसराती-सी नज़र।

सादा दिल के हम सो हमने कुछ छुपाया ही नहीं,
घूरती हमको रही वो, आज़माती-सी नज़र।

उस नज़र से डर-सा लगता है जो हो दिल की नक़ाब,
हमको तो भाती है हाले दिल सुनाती-सी नज़र।

फूल गुलशन के सभी हँसते रहें ये है दुआ
देख कर लगता है डर, हर डबडबाती-सी नज़र।