रीते परे सकल निषंग कुसुमायुध के
दूर दुरे कान्ह पै न तातै चालै चारौ है ।
कहै रतनाकर बिहाइ बर मानस कौं
लीन्यौ हे हुलास हंस बास दूरिवारौ है ॥
पाला परै आस पै न भावत बतास बारि
जात कुम्हिलात हियौ कमल हमारौ है ।
षट ऋतु ह्वै है कहूँ अनत दिगंतनि मैं
इत तौ हिमंत कौ निरंतर पसारौ है ॥91॥