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रूक्मिन बिपर के बोलौउलन, आँगन बइठवलन हे / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

रूक्मिन बिपर[1] के बोलौउलन, आँगन बइठवलन[2] हे।
हमरा सँपतिया[3] के चाह, सँपति हम चाहही[4] हे॥1॥
उलटि पुलटि बिपर देखलन मन मुसकयलन[5]
रूक्मिन, बिधी नइ लिखलन लिलार,[6] सँपति कहाँ पायब हे।
रूक्मिन, देबी जी हथुन[7] दयामान, सँपति तोरा ओहि देथुन[8] हे॥2॥
उहँऊ[9] रूक्मिन चललन, देबी से अरज करे हे।
देबीजी हमरो सँपतिया के चाह, सँपति हम चाहही हे॥3॥
उलटि पुलटि देबीजी देखथिन बड़ी मुसकयलन हे।
रूक्मिन, बिधी नहीं लिखल लिलार, सँपति कहाँ पायब[10] हे।
रूक्मिन, गंगा जी हथुन दयामान, सँपति तोरा देइ देथन हे॥4॥
उहँउ से रूक्मिन चललन, गंगा से अरज करे हे।
गंगाजी, मोरा सँपतिया के चाह सँपति हम चाहही हे॥5॥
उलटि पुलटि गंगाजी देखलन, मन मुसकयलन हे।
रूक्मिन, बिधी नहीं लिखल लिलार, सँपति कहाँ पायब हे।
रूक्मिन, बिसुन[11] जी हथुन दयामान, सँपति तोरा देइ देथुह हे॥6॥
उहँउ से रूक्मिन चलि भेलन, बिसुन से अरज करे हे।
बिसुन, मोरा सँपतिया के चाह, सँपति हम चाहही हे॥7॥
उलटि पुलटि बिसुन देखलन, मन मुसकयलन हे।
रूक्मिन, बिधी नहीं लिखल लिलार, सँपति कहाँ पायब हे।
रूक्मिन, सिबजी हथुन दयामान, वोही सँ देथुन हे॥8॥
उहँउ से रूक्मिन चलि भेलन, सिब से अरज करे हे।
सिबजी, मोरा सँपतिया के चाह, सँपति हम चाहही हे॥9॥
उलटि पलटि सिब देखलन, मन मुसकयलन हे।
रूक्मिन, बिधि नहीं लिखलन लिलार, सँपति कहाँ पायब हे।
रूक्मिन, बरमाँजी[12] हथुन दयामान, ओही सँपति देथुन हे॥10॥
उहँउसे रूक्मिन चललन, बरमाँ से अरज करे हे।
बरमाँजी हमरो सँपतिया के चाह, सँपति कहाँ पायब हे॥11॥
उलटि पलटि बरमाँ देखलन, मन मुसकयलन हे।
रूक्मिन, बिधि नहीं लिखलन लिलार, सँपति कहाँ पायब हे॥12॥
बरमाँजी बलका[13] के बोलौउलन जाँघे बइठवलन हे।
बलका, छठिया[14] राते तोरा होयते, घुरिए[15] चलि अइह हे॥13॥
एतना सुनयते[16] त बलका त बलका अरज करे हे।
बरमाँ जी, हम न जायब[17] अबतार बहुत दुख होयत हे॥14॥
घर ही रोवत मोरा अंबा बाहर मोरा पिता रोइतन हे।
बरमाँ जी, हम नहीं लेबो अबतार, बहुत दुख पायब हे॥15॥
बरमाँ जी, बलका के बोलवलन, जाँघे बइठवलन हे।
बलका सदिया-बिआह[18] तोरा होयतो, तबहि चलि अइह हे॥16॥
बलका बरमाँ से अरज करे अउरो मिनती करे हे।
बरमाँ जी, हम न लिहब अवतार, बहुत दुख होवत॥17॥
घरे जे रोबे मोरा भइया बाहर मोरा पिता रोइतन[19] हे।
सेजिया बइठल रोवे घरनी, बहुत दुख होयत हे॥18॥
बरमाँ जी बलका के बोलवलन, जाँघे बइठवलन हे।
बलका, अजर अमर होई रहिह, बहुत सुख होयत हे॥19॥

शब्दार्थ
  1. विप्र
  2. बुलाया
  3. सम्पत्ति, पुत्र-रूपी सम्पत्ति
  4. चाहती है
  5. मुस्कराये
  6. ललाट, भाल
  7. हे
  8. देगी
  9. वहाँ से
  10. पाओगे
  11. विष्णु भगवान
  12. ब्रह्मा
  13. बालक
  14. छठी, पुत्र जन्म के छठे दिन ‘छठी’ नामक विधि होती है, उसी रात
  15. घूम-फिरकर आ जाना अथवा लौट आना
  16. सुनते ही
  17. जाऊँगा
  18. शाही-ब्याह
  19. रोवंेगे