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रूप-राशि श्रीराधे! जय जय / स्वामी सनातनदेव

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राग देश, ताल कहरवा 21.7.1974

रूपराशि श्री राधे जय जय।
मोहन की मोहनि! मन-भाविनि! राम-रसिकिनो राधे! जय जय॥
अग-जग वर वैभव - विस्तारिणी!
सुर-सेविता! सकल भय-हारिणि!
भव-भव-विभव-पराभव-कारिणि[1]!
भव-तारिणि श्री राधे! जय जय॥1॥
माया - मोह - द्रोह - क्षयकारिणि!
निज-जन-भक्ति-मुक्ति-विस्तारिणि!
महाभावमयि - राति - संचारिणि!
रसिक - रंजिनो राधे! जय जय॥2॥
श्याम - भृग - सेवित नव नलिनी!
श्याम-सुधा - रस - रसिका रमणी!
निजजन-मन-सरसिज-शुचि-अलिनी!
रति-रस-क्षरणि राधि के! जय जय॥3॥
हरि - हर - ब्रह्म - वन्दिते वरदे!
उमा - रमा - वागीश्वरि - रसदे!
व्रजवल्लवि - सेवा शुचि - सुखदे!
हरि-रसदे! श्री राधे! जय जय॥4॥
महाभाव - सन्दीपनि! जय जय।
रसिकराज - संजीवनि! जय जय।
मम मति-रति-गति दायिनी! जय जय।
रति अनपायिनि राधे! जय जय॥5॥

शब्दार्थ
  1. संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली