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रूप की साक्षात् प्रतिमा / राम लखारा ‘विपुल‘

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रूप की साक्षात प्रतिमा देख सम्मुख चाहतों के,
मौन है संदर्भ सारे अर्थ खाली हो गए हैं।

मोह वश होकर नयन
हर ओर ढूंढे एक चेहरा
हाय जादू दो नयन का
है उतरता और गहरा
इक नजर यूं फेरने से सृष्टि के सारे नजारें
चेतना पाकर स्वयं ही इंद्रजाली हो गए हैं।

रात का उपवन हमेशा
चुप्पियों के शोर में था
फूल लेकिन इक निरंतर
फैलने के जोर में था
गंधवाही ! तुम चले आए कृपा है स्वप्न सारे
फूल-फलकर केवड़े की एक डाली हो गए हैं।

कौन सुख था जो रहा वंचित
अभी तक इस हृदय से
किंतु तुमने तार छेड़े
प्रेम के यूं राग लय से
हो गए बौने सभी सुख देखकर तुमकों हमारे
मोह सारे बुद्ध बनकर आम्रपाली हो गए हैं।