भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

रेल्वे कॉलोनी / श्याम महर्षि

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कॉलोनी री
सड़क रै खम्भा माथै
लागैड़ा लोटियां रो
मंदो पड़तौ उजास
अर भाकफाटणै री
मनस्या करतै दिन री
ओळखाण कराणै खातर
मुरगो बांग देवै
जाणै क्वाटरां मांय
मोड़ै सूत्या लोगां नै
अणूतो डिस्टर्ब करै।

भाटा-कोयलां रो
धूंवो
हांफती सिगड़यां सूं
निकळ‘र
अठीनैं-वठीनैं
क्वाटरां अर आभै कानीं
भागणै खातर
हिचकै अर ऊंतावळ करै।

तरतीब सूं बणैड़ा
आं क्वाटरां रै
साम्हैं ढळैडी
मूंज री माच्यां माथै
ओज्यूं ई
नाना-मोटा टाबर
सूत्या कै बैठ्या है,

जियां
तिरती न्याव माथै
बैठ्या हुवै लोग
मोटयार आपरै
क्वाटरां सूं
निकळ रैया
कोई न्हायोड़ा तो
कोई ईयां ईं
आख्यां मसळता
साइकल रै पैडल माथै
पगां नै पटकता
व्हीर हुय रैया है
कैई ऊंतावळा लोग
वर्क्सशाप रै सायरन री
धूजती आवाज कानीं
भाजै अर
हांफिजता जाय रैया है
ड्यूटी रै सदैव नैं
पूरो करणै खातर।

दिन उगतां ई
सूरड़ी आपरै
कडूम्बै साथै
कॉलोनी रै
क्वाटरां लारै
अठीनैं-वठीनैं
मटरगस्ती करैं,

क्वाटरां रै
नेड़ै ई
चौराये माथै
टूंटयां रै ढुळते पाणी सूं
बणेड़ै तळाब मांय
न्हावै सूरड़ा
जियां कोई न्हावै
गंगाजी भोम
पुन्न खातर।

रेल्वे कॉलोनी
म्हनै करावै दिठाव
नूंवी न्यारी दुनियां रो
जाणै
सगळै संसार रा लोग
रेल्वे मांय नौकरी करै
अर
रेल आं सगळां री
जिन्दगाणी मांय
रचपचगी
जियां कै
मिनखा रै साथै
वां रौ सांस