भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

लड़का-बीहा रचैलकै दहेज बिन / सुरेन्द्र प्रसाद यादव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लड़का-बीहा रचैलकै दहेज बिन
राजी खुशी सें ना
हाय राम राजी खुशी सें ना
हाय राम बिना तिलक रोॅ
मॅहगोॅ पड़लै
बेटिये माय केॅ ना
सालोॅ भरी सें पेटकुनिया देलेॅ छै
दमादें सासू कन ना
हाय राम दमादें ससुर कन ना
हाय राम पड़ले रहे छै
दुआरी पर हरदम
ठोकलोॅ ज्यों किल्ला ना
लाठीं लै केॅ बोढ़नी लै केॅ
बेटा के माय-बाप ना
हाय राम-दुल्हा के गोतिया ना
हाय राम समधी दुआरी
पर धरना देलेॅ छै
टिकलोॅ छै महिनो सें ना
हेनोॅ रवैया देखी बेटी माय
हाय अकुलावै ना
हाय राम करेजोॅ छै चूरै ना
हाय राम बेटी माय के भीतरे भीतर
सौंसे दम घूटै ना
बेटी अलगे कपसै कानै
माय-बाबू करी करी ना
हाय राम खोपोॅ नोची-नोची ना
हाय राम ई देखी
माय के सिट्टी-पिट्टी सब्भे हेरैलै ना
हथपकड़ा बीहा मँहगी पड़लै
सोच-फिकर में ना
हाय राम रहैं उपासोॅ में ना
हाय राम बेटी बापोॅ
केॅ छरबिन्द लागलै
ऐंगना में उछलै ना
सोचै छै तिलको सें मँहगोॅ है रं के
बीहा धरोआ ना
हायराम बीहा धरौंआ ना
हाय राम आत्मेदाह के मोॅन करै छै
झरिया में झरकी ना
पैहिलें एक्के बेटिये केरो
माथा भार छेलै ना
हाय राम बेटिये खाय छेलै ना
हाय राम आबेॅ दुल्हा साथे ओकरोॅ
मैयो-बाप खाप छै ना