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लद्दाख से / तेनजिन त्सुंदे / अशोक पांडे

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बस, निगाह भर दूर है तिब्बत
—उन्होंने कहा —
दुमत्से की काली पहाड़ी से
यह तिब्बत है अब

मैंने
पहली बार देखा
अपने मुल्क तिब्बत को

हड़बड़ी में छिपते-छिपाते
मै टीले पर पहुँच गया
मैंने मिट्टी को सूँघा
ज़मीन को कुरेदा
सूखी हवा को सुना
और सुना बूढ़े जंगली सारसों को
मुझे सीमा नज़र नहीं आई

क़सम खा के कहता हूँ कुछ भी
फ़र्क नहीं था वहाँ
मैं नहीं जानता
मैं वहां था या यहाँ
मुझे नहीं पता था
मै वहाँ था या यहाँ

लोग कहते हैं
क्यांग[1] हर जाड़ों में आते हैं यहाँ
लोग कहते हैं
क्यांग हर गर्मियों में जाते हैं वहाँ

अँग्रेज़ी से अनुवाद : अशोक पांडे

शब्दार्थ
  1. तिब्बत और लद्दाख के उत्तरी मैदानों में पाए जाने वाले जंगली गधे