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लपक रहे हैं अँधेरे, हवा सुराग़ में है / शाहिद कबीर

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लपक रहे हैं अँधेरे, हवा सुराग़ में है
ये देखना है कि कितना लहू चिराग़ में है

सब अपने-अपने चिराग़ों को ले के चलते हैं
किसी की शम्मा में लौ है किसी के दाग़ में है

किसी दलील से क़ाईल[1] न होंगे दीवाने
जो बात दिल में बसी है वही दिमाग़ में है

लपक रहा है हर इक़ सिम्त ख़ौफ़ का आसेब[2]
जो जंगलों में था कल तक वह आज बाग़ में है

महक रही है उजड़ कर भी ज़िंदगी "शाहिद"
किसी की याद की ख़ुश्बू अभी दिमाग़ में है

शब्दार्थ
  1. आश्वस्त
  2. प्रेत