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लबी रे बहुरिया लबो कोहबर / अंगिका लोकगीत

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

नयी दुलहन है, नया कोहबर है, नया स्नेह लगा है, नयी नींद है और उसके सुहाग की यह प्रथम रात है। इस गौरव से वह रूपगर्विता गौरवान्वित है। लेकिन, उसकी भाभी, जिसने इस सुहाग का अवसर दिया है, आज उसके सुहाग को आधा बाँट रही है। सलहज तथा नदोसी में तथा ननद-भाभी में मजाक का रिश्ता है, इसलिए संभव है मजाक किया गया हो या सलहज अपने ननदोसी से बहुत घुलमिल कर रहती हो, जिस कारण उस पर संदेह किया गया हो।

लबी<ref>नई</ref> रे बहुरिया लबो<ref>नया</ref> कोहबर, लब लब<ref>नया</ref> लागल सिनेह हे।
सुहाग के रात भागो<ref>भाग्य</ref> के रात, एहो लब नीन हे॥1॥
पथना<ref>पायताने</ref> सुतलि ददिया सासु, सोहाग के रात यहो लब नीन हे॥2॥
उठु उठु सासु हे हमर बोल, उठि के पहिरो पटोर हे।
कैसं हम उठब बाबू तोहरो बोल, माँगहुँ धिया के सोहाग हे॥4॥
देलाँ सोहाग जेठि भौजो, जिनि मोर आधो आध बाँटे हे।
सोहाग के रात भाग के रात, यहो नब नीन हे॥5॥

शब्दार्थ
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