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लाल रँगवारे घेरदार घाँघरे सोँ घिरे / मानस

लाल रँगवारे घेरदार घाँघरे सोँ घिरे ,
नेक ना उघारे भारे सुखमा समूल हैं ।
जग जीत वारे पति प्रीति रीति वारे केधौँ ,
काम के नगारे उलटारे झपे झूल हैँ ।
उपमा अतूल पाय छोड़ि मति भूल बैन ,
मनसा कहे ते करैं कबिन कबूल हैँ ।
निरखे नितंब नीके वा नितंबनी के मानों ,
जंघ जुग कदली के थंभ भूल मूल हैं ।

मानस का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।