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लावा / ओम पुरोहित ‘कागद’

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यथार्थ की कोठरी में
समय की मुंह पट्टियों से बंधी
मेरी लेखनी,
असहाय हो
वयस्क होने से पहले ही
घुट कर रह गई।
महंगाई के स्याहीसोखों ने
मेरी कलम की स्याही सोख ली।
समाज काआ कागज
पहले ही काला हो चुका है,
मेरे नाम भोंडे प्रतीकों की काली स्याही से।
पिन दर्द बनकर
मुझे ही चुभन देती है;
रिश्तों के दबाव मे आकर ।
मेरी अंगुलिया,
मात्र रुमाल बन कर
जेब में पड़ी रहती है।
लावा भरा पड़ा है मेरे भीतर।
किसी को क्यूं भेंट करूं ?
जब प्रकृति ने इस हेतु,
मुझे ही चुना है।

भले ही किसी के शब्दो में
मुझे मेरा गांव
रास न आया हो
परन्तु मैं जानता हूं ;
मेरा सहित्य
भूत बन कर
मेरा आरोह कर चुका है।

मैं असहाय व चुप जरूर हूं
लेकिन
मै भी हाथों मे अंगुलियां,
मन में आकाक्षा रखता हूं।
एक दिन उगल दुंगा कागज पर
अंगुलियों के पोरों से,
दिल में भरा संवेदन
दर्द से धोकर !

मैं जानता हूं
मैं फटा हुआ ढ़ोल हूं
लेकिन
हूं तो ढ़ोल ?
यह तो आप भी जानते हैं,
कभी मैं भी बजत था;
फिर बजूंगा एक बार मैं
अर्थ का मंढ़ना मंढ़वा कर।