भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

लावौ दौ माचिस / पारस अरोड़ा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लै आ माचिस अर सुण लै
कै तूं इणरौ की नीं करैला
सिबाय इणरै
कै आपरी बिड़ी सिळगाय लै
तूळी नै फूंक देय साबळ बुझाय दै
अर पेटी म्हनै पाछी कर दैला।
ले आ माचिस
पण याद राखजै
कै इणसूं थनै फकत
चूल्हौ सिळगावणौ है
रोटियां पोवणी है
काम काढ़ पेटी म्हनै पाछी देवणी है ।

आ लै, इणसूं तूं स्टोव सिळगाय’र
दो चाय बणा सकै
घर-जरूत सारू?
दो-चार तूळियां राख सकै
पण पेटी पाछी देवणी है, याद राखजै।

अंधारौ पड़गौ है, दया-बती करलै
दो-चार तूळियां व्है तो
पेटी तूं इज राखलै
अबै तौ तूं ई जांणै
थनै आंरौ कांई करणौ है
म्हैं जावूंला
म्हनै नुबी माचिस रौ प्रबंध करणौ है।

हां, लावौ दौ माचिस।
म्हैं बिस्वास दिरावूं
कै म्हैं इणरौ कीं नीं करूंला।
बीड़ी सिळगाय दोय कस खेंचूंला
अेक आप ई खेंच लीजौ
पछै सोचांला-
आपां नै कांई करणौ है
थांरी पेटी थानै पाछी कर दूंला।

लावौ दौ माचिस
चूल्हो सिळगायलां
दोय टिक्कड़ पोयलां
अेक थे खाइजौ/अेक म्हैं खांवूला
पछै आपां सावळ सोचांला
कै अबै आपांनै
कांई, कीकर करणौ है।

म्है करूंला अर आप देखौला
तूळी रौ उपयोग फालतू नीं व्हैला
दोय कप चाय बणाय’र पीलां
पछै सोचां
कै कांई व्हेणौ चाइजै
समस्यावां रौ समाधान
माचीस सूं इण बगत इत्तौ इज काम।

ठीक है कै जेब में इण बगत
पइसा कोनीं
माचिस म्हारै कनै ई लाध सकै
बात अबार री है
अर बात दीया-बत्ती री है
उजास व्हियां सैं सफीट दीसैला।
आपरी इण माचिस में तौ
चार तूळियां है
म्हनै तौ फकत अेक चाइजै
तीन तूळियां समेत
थांरी माचिस थांनै पाछी करदूं ला।
लावौ दौ माचिस
म्हैं विस्वास दिरावू
कैं म्हैं इणरौ कीं नीं करूंला।