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लुकचुक बेरा / रूप रूप प्रतिरूप / सुमन सूरो

लुकचुक बेरा हवा बहै छै बाबरी;
आबी रल्छै साँझ री!
चल झटपट गगरी लै पानी घाट में
रसिया होता बहियारोॅ के बाट में
खतम करी केॅ बाँकी बचलोॅ काज री।
बहते होतै घाम थकन के गाल में
तय्यो होता जल्दी-जल्दी चाल में
सुधि पर यै दुखिया के होतै राज री।
जल्दी-जल्दी चल सब काम पुराय केॅ
द्वारी पर खड़ु ऐबै पलक बिछाय केॅ
पीबी केॅ सबटा हिरदय के लाजरी।