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लोगवा सें रोजे पूछौं, पल-पल बाट देखौं / छोटेलाल दास

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॥शबरी की व्यथा॥

लोगवा सें रोजे पूछौं, पल-पल बाट देखौं।
कब ऐभौ हमरो मड़ैया, हो रघुनंदन स्वामी॥1॥
नित दिन मढ़ी लीपौं, फल-फूल नित लावौं।
नित लावौं निरमल नीर, हो रघुनंदन स्वामी॥
कोमल-कोमल फूल, आसनी बनाबौं नित।
नित दिन रहौं मैं बेचैन, हो रघुनंदन स्वामी॥3॥
गुरुजीं ने कैहने छेलै, कुटिया पे रहियें बेटी।
एक दिन ऐतौ भगवान, हो रघुनंदन स्वामी॥4॥
भक्ति-उपदेश देतौ, सद्गति तोरा देतौ।
तब तों छोड़िहें निज देह, हो रघुनंदन स्वामी॥5॥
गुरुदेव कहि गेलै, हमरा के छोड़ि गेलै।
गुरु बिनु लागै छै अन्हार, हो रघुनंदन स्वामी॥6॥
साग-पात खोटि-खोटि, कंद-मूल-फल आनि।
करै छीयै दिन निरबाह, हो रघुनंदन स्वामी॥7॥
केश सब पाकि गेलै, कमरो भी झुकि गेलै।
चलै छीयै लाठी टेकि-टेक, हो रघुनंदन स्वामी॥8॥
भीलनी समझि लोगें, दुरदुर करै रोजे।
रोजे छै छै डाँट-फटकार, हो रघुनंदन स्वामी॥9॥
‘लाल दास’ मैया रोवै, दरसन देहो राम।
अब नैं छै जीयै केरो चाह, हो रघुनंदन स्वामी॥10॥