भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
वक़्त की बात / माधवी शर्मा गुलेरी
Kavita Kosh से
सपनीली सुबह
उनींदी-सी होती है
तो कभी
चटख़ मुस्तैद भी
दोपहरी धूप
देह पर दमके काँसे-सी
तो कभी
सिकोड़ देती है पोर-पोर भी
ढलती साँझ
लगे रूमानी बेहिसाब
तो कभी
बेमानी-सी भी
स्याह रात
गुज़रे नीम-बेहोशी में
तो कभी
लगाए फिरती है गश्त भी
...
...
आसमाँ एक है हर पल
बदल जाती हैं बस
खिड़कियाँ ही ।