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वक्त कहाँ से लाएं / राजेश श्रीवास्तव

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जीवित संवेदनाओं को बचाना ही दुष्कर है
मुर्दा संबंधों के लिए वक्त कहाँ से लाएं।

कहाँ तक जोतूं-निराऊं
दम तोड़ते संबंधों का
बंजर सारा ही खेत है
आँखों का पानी जाने कहाँ छन गया
पलकों की कोरों में
बची अब सिर्फ रेत है

बहुत भीड़ है दूर तक हर किसी को रौंदती हुई
फिर टूटते कंधों के लिए वक्त कहाँ से लाएं।

जाने कब आया जलजला
जाने कब पड़ गई
दादालाही इमारत में दरार
धूपछाँही मौसमी रिश्तों में अब
अपनेपन की
सोंधी सोंधी हवा है फरार

अब तो बस खूनी शिकंजे ही पहचानते हैं लोग
स्नेही भुजबंधों के लिए वक्त कहाँ से लाएं।