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वसंत एक तुलना / पंकज सुबीर

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वसंत तुमसे अलग नहीं है ...,
वसंत तुमसे सचमुच अलग नहीं है ।
दूर कहीं कुहुक रही है कोयल,
मुझे एसा लग रहा है
तुम ऑंगन में खड़ीं
अपनी मीठी आवाज़ में
मुझे पुकार रही हो ।
फाल्गुनी हवाऐं मुझे छूकर जा रही हैं
ठीक वैसे ही ,
जैसे तुम प्यार से मुझे छूकर
दूर कर देती हो ,
युगों की थकान ।
आम्र वृक्ष मँजरियों से लदे हैं ,
तुम भी तो एसी ही हो ,
प्रेम और स्नेह से लदी हुई
हमेशा ।
खेतों में फूल रही है सरसों
चटख़ पीली ,
या कि तुमने फैलाई है
अपनी हरे बूटों वाली
पीली साड़ी
धोकर सुखाने के लिये ।
धरती अपनी संपूर्ण उर्वरा शक्ति
समर्पित कर रही है ,
खेतों में खड़ी फ़सलों के पोषण के लिये ,
तुम भी तो एसा ही करती हो ।
वसंत तुमसे अलग नहीं है
'माँ ' वसंत तुमसे सचमुच अलग नहीं है ।