वसंत और चैत / मृदुला सिंह

वसंत जाते हुए ठिठक रहा है
कुछ चिन्तमना
धरती के ख्याल में डूबा
मुस्काया था वह फागुन के अरघान में
जब गुलों ने तिलक लगाया था
अब फागुन बीता तो
दस्तक हुई दरवाजे पर
आगंतुक है चैत
नीम ढाक महुये के कुछ फूल लिए

संवस्तर का चांद
जड़ा है सर के ऊपर
छिटकाता नवल चांदनी
पेड़ों ने आहिस्ता से
झाड़े हैं पीले पत्ते
और नव कोंपल उग आई हैं
उदास ठूंठों पर

खेतों का सोना किसानों के
घर जाने को आतुर है
खलिहानों की रानी ने
छेड़ दिया है चैती का मादक राग
लय पर उसकी
थिरक उठा खलिहान
झूमकर पुरवा नाचती
बटा रही है उनका हाथ
दाने आएंगे भरेगा खाली भंडार
जीवन की आंच पड़ेगी अब कुछ मध्यम

उपकारी चैत बड़ा संस्कारी है
जीवन से भरा मनोहारी है
वह शक्ति के जस गीतों से
कर रहा बसंत की विदाई
प्रकृति के सुनहरे रंग चैत को भेंट कर
बसंत भी अब धीरे-धीरे लौट रहा अपने देश
धरती की हरी गुलाबी कामनाओं के साथ

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