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वसन्ती धूप / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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यह वसन्ती जाफ़रानी धूप-
चू रहा है मृदुल अँग-अँग से उनींदा रूप!

अलक बिखरी है-
कि जिसमें फरफराते पंछियों के
तरगरम ताजे तरन्नुम हैं गुँथे से!
काँचनारी पहन साड़ी, पान खाये हैं,
नाक में है लौंग-जिससे किरण फूटे!

लॉन पर बैठी अकेली,
गुनगुनाती, नील स्वेटर बनु रही है,
औ’ ‘बिनाका गीतमाला’ सुन रही है,
मृदुल पलकों में क्षितिज के पार के सपने सँजो-
कुछ गुन रही है!

देह में जल-सा रहा है-
मौन-मद्धिम रूप!

यह वसन्ती जाफ़रानी धूप-
चू रहा है मृदुल अँग-अँग से उनींदा रूप!