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वही रंग-ए-रूख़ पे मलाल था ये पता न था / सिद्दीक़ मुजीबी

वही रंग-ए-रूख़ पे मलाल था ये पता न था
मिरा ग़म भी शामिल-ए-हाल था ये पता न था

वही शाम आख़िरी शाम थी ये ख़बर न थी
वही वक़्त वक़्त-ए-ज़वाल था ये पता न था

मुझे कर गया जो तही तही भरे शहर में
वो मिरा ही दस्त-ए-सवाल था ये पता न था

मुझे बुत बना के चले गए कि न रो सकूँ
उन्हें मेरा इतना ख़याल था ये पता न था

वो हवा-ए-मर्ग थी जिस से दिल का दिया बुझा
मिरे दिल का बुझना कमाल था ये पता न था

मैं ‘मुजीबी’ ढूँढू कहाँ उसे वो कहाँ मिले
वो तो अपनी मिसाल था ये पता न था