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वही है बस्ती, वही हैं गलियाँ / समीर परिमल

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वही है बस्ती, वही हैं गलियाँ, बदल गया है मगर ज़माना
नए परों के नए परिंदे, नई उड़ानें, नया फ़साना

चलो भुला दें तमाम वादे, तमाम क़समें, तमाम यादें
न मैं मुहब्बत, न तुम इबादत, न याद करना, न याद आना

करीब आ के, नज़र मिला के, मुझे चुरा के चला गया वो
पता न उसका, ख़बर न ख़ुद की, भटक रहा है कोई दिवाना

दुआ किसी की बनी मुहाफ़िज़, उसी के साए में हम खड़े हैं
गुज़र चुकी है यहाँ से आँधी, मगर सलामत है आशियाना

न सुब्ह ही अब तो शबनमी है, न शाम ही अब वो सुरमई है
हवाएँ गुमसुम, फिज़ाएँ बेदम, रहा न मौसम वो आशिक़ाना