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वह हठीला बिम्ब! / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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न जाने कौन-सा एक चिर-हठीला बिम्ब
मँडराता है मेरी चेतना पर,
युग-युगों से!
रह-रह कर वह झपक-झपक उठता है
बार-बार-
मेरे मन की कजलाई राख से;-
जैसे, रह-रह उठ-उठ आते राजस्थानी आँधी-अंधड़ के झोंके
चमका-चमका जाते हैं श्रंगार,
यायावरों के अधबुझे चूल्हों की!

अथाह-नीले समुद्र के तीर-
आकाश-यात्रा से उतर रहा हो कोई वायुयान,
दूर खजूरों में डूबती सूर्य की तड़पती
सिन्दूरी-सुनहरी लालिमा को-
अपने विंग्ज़ पर कौंधपूर्वक समेटता!
चक्कर-काटते-उड़ते-उतरते विमान में से-
चहकती नीली खुशबुएँ उड़ रही हों-
नींबू-संतरों-अंगूरों की,
और रजत-सुनहले धागों से जड़े-गुँथे
ढेर-ढेर पुष्पहारों व गुलदस्तों की!

पारदर्शी-नायलनिया, इन्द्रधनुषी परिधान पहने,
यान-से-उतरती क्वाँरी गुदगुदारी हँसमुख गोरटियों के
चहकते कुन्तलों की लरजतीं तैल-गंधों से
निंदियारी-सी हो रही हो-
वह अनारों के फूलों-सी संझा!

लहरों में रोर हो,
समुद्री ताड़-नारिकेल के पेड़ खरखरा रहे हों,
दूर नींद-डूबी पालदार नाव के परे-उधर, हाँ उधर-
कोई नन्हा काला पंछी डूबते सूर्य के बिम्ब में
खो-सा गया हो!
चुलबुली अरुण खिलखिलाहटों से सिन्धु-तट
मुखरित-निनादित हो रहा हो-
जैसे तीज-चौथ की चाँदनी में सुहागराती हथेलियाँ,
मेंहदी-चित्रों से!

ओह-
न जाने कौन-सा चिर-हठीला बिम्ब,
रह-रहकर उभरता यह बिम्ब,
झँपक-झँपक उठता है मुझमें,-यों,
न जाने क्यों!