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वादा कर भरमाया तो / गोपाल कृष्ण शर्मा 'मृदुल'

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वादा कर भरमाया तो।
झूठी कसमें खाया तो।।

कल तक टेढ़ा-मेढ़ा था,
आज चलो मुस्काया तो।।

पछताना ही होगा फिर,
अवसर पकड़ न पाया तो।।

जेब रही महफूज़ भले,
उसने हुनर दिखाया तो।।

आखि़र उसका क्या मतलब,
ग़्ाुस्सा नज़र न आया तो।।

साथ निभाया अगर नहीं,
कुछ दिन दिल बहलाया तो।।

फिर न कहूँगा ग़ज़ल कभी,
तुमसे दाद न पाया तो।।