Last modified on 13 अगस्त 2013, at 11:27

वासना / धनंजय वर्मा

आँच में तपकर
दूध उफना
आग ने पी लिया
एक सोंधी महक
माहौल में समा गई ।

वासना का ज्वार
संयम की सीमाएँ तोड़
उफना
दमित आकांक्षा ने तृप्ति पाई
एक दर्द मीठा-सा
मन में जगा
भला लगा ।

दूध चुक गया
वासना बुझ न पाई...।