वाही मुख मंजुल की चतिं मरीचैं सदा
हमकौं तिहारी ब्रह्म-ज्योति करिबौ कहा ।
कहै रतनाकर सुधाकर-उपासिनि कौं
भानु की प्रभानि कैं जुहारि जरिबौ कहा ॥
भोगि रहीं बिरचे विरंचि के संजोग सबै
ताके सोग सारन कौं जोग चरिबौ कहा ।
जब ब्रजचंद को चकौर चित चारु भयौ
बिरह चिंगारिनि सौं फेरि डरिबौ कहा ॥52॥