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विचारणा पर कब्ज़ा / कमलेश कमल

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बाजार और व्यवस्था के बोझ से
कभी आता है वह दौर भी
जब नहीं होता स्वागत
रचनात्मक मत-भिन्नताओं का

आसान होता है तब
कि आप बहें धारा के साथ
और किनारा कर लें
अंतर्मन की आह और आहट से

ऐसे में बहुत मुमकिन है
कि आप बना लें निष्कर्ष को
निष्पत्ति की जगह
बौद्धिक-विलास का
टेक ऑफ प्वाइंट

हाँ, सच है
कि बदलता नहीं हकीकत
धारणाओं, मान्यताओं के वैविध्य से
पर सुविधा का सौदा
बना देता है इसका भी बहुवचन

लेकिन बेहद खतरनाक होता है
वह लकदक और आक्रामक दौर
क्योंकि, तब
बेमानी हो जाती है
मौलिकता कि तलाश

विचार, ख़्याल, संस्कार और भाव
सब हो जाते है भीड़ के ही
और फिर होता है
आपके मानस पर
सिहासनों से आयातित
कुंद-विचारों का
स्थूल और निर्मम स्थापन