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विद्यालय के प्रति / रमेश रंजक

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कर्ज़ है उस धूल का मुझ पर ।

गीत मेरे जिस जगह जन्मे-पले
छन्द के सुकुमार साँचों में ढले
क़लम ने पाई जहाँ पर थपथपी
कर्ज़ उस स्कूल का मुझ पर ।

कर्ज़ है उस धूल का मुझ पर ।

कर्ज़ में डुबी हुई हैं धमनियाँ
ब्याज दे पाती नहीं मजबूरियाँ
इसलिए अधिकार है उस बाग़ के
हर अनूठे फूल का मुझ पर ।

कर्ज़ है उस धूल का मुझ पर ।