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विराम-चिह्न / संजय शाण्डिल्य

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भाषा का आदमी
सबसे अन्त में
विराम-चिह्नों के पास जाता है
जाता है
और धीरे ...धीरे ...
प्यार के जाल में उन्हें फाँसता है
फाँसता है और साधता है
साधने के बाद
भाषा का आदमी
धीरे ...धीरे ...
भाषा से उन्हें
बाहर फेंक देता है

यक़ीन न हो
तो आजकल जो पढ़ रहे हो
या लिख रहे हो
उसे ग़ौर से देखो
तुम्हें ज़रूर लगेगा
तुम्हारी भाषा में
बहुत कम बच गए हैं विराम-चिह्न !