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आपां मिळिया? / श्यामसुंदर भारती

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{{KKCatKavita‎}}<poem>यूं म्हैं थां सूं मिळियौ जकौ म्हैं नीं हौ थां ई म्हां सूं मिळिया आपां जका थां नीं हा
मिळतां पांण म्हैं थां तपाक सूं मिळियौहाथ आगै कियौ जकौ म्हैं म्हां’रौ नीं हौ थां ई म्हां सूं मिळियाझट हाथ लांबौ कियौ जका थां जकौ थां’रौ नीं हाहौ
मिळतां पांण म्हैं तपाक सूं हाथ आगै कियौ जकौ म्हां’रौ नीं हौ थां ई झट हाथ लांबौ कियौ जकौ थां’रौ नीं हौ  यूं आपां मिळ नै दूजा-दूजा हाथ मिळाया दूजी-दूजी मुळक पसारी खिणखौळै चढिया
घणी सारी दूजी-दूजी बातां करी
इण भांत बार-बार दूजा-दूजा आपां एक-दूजे सूं मिळिया
आपां कदैई मिळिया ?
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