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<Poem>
आपको इश्क के इज़्हार से डर लगता है
और हमें आपके इनकार से डर लगता है

मेरे मासूम से बच्चे की आँख में आँसू
ऐ ग़रीबी हमें त्यौहार से डर लगता है

माँ मुझे अपने ही आँचल में छुपाये रखना
ढाल को कब किसी तलवार से डर लगता है

ये ही लूटेगा हमें जाके किसी कोने में
हमको इस काफ़िला सालार से डर लगता है

अब ग़ज़ल में किसी मुफलिस की कहानी कहिये
आँख से, ज़ुल्फ़ से, रुखसार से डर लगता है

ऐ सफीने तेरा अब कौन मुहाफ़िज़ होगा
जब तुझे अपनी ही पतवार से डर लगता है

खुद बना देते हैं नेता इन्हें हम लोग यहाँ
और कहते हैं कि सरकार से डर लगता है

मै नहीं डरता 'मनु' अपने किसी दुश्मन से
बस मुझे अपने किसी यार से डर लगता है </poem>
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