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|रचनाकार= राणा प्रताप सिंह
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<poem>नया कोई गीत ले
जंग चलो जीत ले

घटती है नम्रता
बढ़ती उद्विग्नता
चुकती शालीनता
मीठा पाया है बहुत
आज चलो तीत ले

कथनी को तोल दे
दूजों को मोल दें
वातायन खोल दे
भीड़ भरी दुनियां में
खोज नया मीत लें

दृश्य ये विहंगम है
कष्टों का संगम है
जग सारा जंगम है
बासंती झोंके तज
आज शिशिर शीत लें

</poem>