भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
चिरजीवहु जसुदा कौ नंदन सूरदास कौं तरनी ॥<br><br>
भावार्थ :-- कन्हाई अब पृथ्वीपर दो-दो पग चल लेता है । श्रीनन्द-रानी अपने मनमेंमन मेंजो अभिलाषा करती थीं, उसे अब (प्रत्यक्ष) देख रही हैं । (मोहनकेमोहन के) चरणोंमें चरणों में रुनझुन नूपुर बजते हैं जिनकी ध्वनि मनको मन को अतिशय हरण करनेवाली करने वाली है । वे बैठ जाते हैं और फिर तुरंत उठ खड़े होते हैं - इस शोभाका शोभा का तो वर्णन ही नहीं हो सकता । सुन्दरताके सुन्दरता के इस अद्भुत ढंगको देखकर व्रज की सब युवतियाँ थकित हो गयी हैं । सूरदासके सूरदास के लिये (भवसागरकीभवसागर की) नौकारूप श्रीयशोदानन्दन चिरजीवी हों ।