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तेरे ग़म को उभारता क्यूँ हूँ
ख़ुद को मुश्किल में डालता क्यूँ हूँ

तू ख़ुदा है , न देवता कोई
रात दिन तुझको पूजता क्यूँ हूँ

मुस्कुराता हूँ जीत पर तेरी
हर क़दम ख़ुद मैं हारता क्यूँ हूँ

जानता हूँ वो सच ही बोलेगा
आईना फिर भी देखता क्यूँ हूँ

उससे मिलना तो बड़ी बात नहीं
फिर भी हसरत को मारता क्यूँ हूँ

लाख कोशिश करूँ, न बोलेंगे
पत्थरों को तराशता क्यूँ हूँ

अपना अंजाम जानता हूँ 'मनु'
हर घड़ी फिर भी सोचता क्यूँ हूँ</poem>
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