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{{KKRachna
|रचनाकार=गोपालदास "नीरज"
|संग्रह=बादलों से सलाम लेता हूँ / गोपालदास "नीरज"}} [[Category:कविता]]<poeM>प्यार अगर थामता न पथ में उँगली इस बीमार उमर कीहर पीड़ा वैश्या बन जाती, हर आँसू आवारा होता।
प्यार अगर थामता निरवंशी रहता उजियालागोद पथ में उँगली इस बीमार उमर भरती किसी किरन की<br>,हर पीड़ा वैश्या बन जातीऔर ज़िन्दगी लगती जैसे-डोली कोई बिना दुल्हन की, दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर आँसू आवारा फूल झुलसताकरुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर न बुहारा होता।<br><br>प्यार अगर...
निरवंशी रहता उजियाला<br>मन तो मौसम-सा चंचल हैगोद सबका होकर भी भरती किसी किरन की,<br>काऔर ज़िन्दगी लगती जैसे-<br>डोली कोई बिना दुल्हन कीअभी सुबह का,<br>अभी शाम कादुख से सब बस्ती कराहतीअभी रुदन का, लपटों में हर फूल झुलसता<br>करुणा ने जाकर नफ़रत अभी हँसी का आँगन गर और इसी भौंरे की ग़लती क्षमा बुहारा यदि ममता कर देतीईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा होता।<br>प्यार अगर...<br><br>
मन तो मौसम-सा चंचल जीवन क्या है<br>एक बात जोसबका होकर इतनी सिर्फ समझ में आए-कहे इसे वह भी न किसी का<br>पछताएअभी सुबह का, अभी शाम का<br>सुने इसे वह भी पछताएअभी रुदन का, अभी हँसी का<br>मगर यही अनबूझ पहेली शिशु-सी सरल सहज बन जातीऔर इसी भौंरे की ग़लती क्षमा न यदि ममता कर देती<br>ईश्वर तक अपराधी होता पूरा खेल दुबारा अगर तर्क को छोड़ भावना के सँग किया गुज़ारा होता।<br>प्यार अगर...<br><br>
जीवन क्या है एक बात जो<br>मेघदूत रचती न ज़िन्दगीइतनी सिर्फ समझ में आए-<br>वनवासिन होती हर सीताकहे इसे वह भी पछताए<br>सुन्दरता कंकड़ी आँख कीसुने इसे वह भी पछताए<br>और व्यर्थ लगती सब गीतामगर यही अनबूझ पहेली शिशु-सी सरल सहज बन जाती<br>पण्डित की आज्ञा ठुकराकर, सकल स्वर्ग पर धूल उड़ाकरअगर तर्क को छोड़ भावना के सँग किया गुज़ारा आदमी ने न भोग का पूजन-पात्र जुठारा होता।<br>प्यार अगर...<br><br>
मेघदूत रचती न ज़िन्दगी<br>जाने कैसा अजब शहर यहवनवासिन होती हर सीता<br>कैसा अजब मुसाफ़िरख़ानासुन्दरता कंकड़ी आँख की<br>भीतर से लगता पहचानाऔर व्यर्थ लगती सब गीता<br>बाहर से दिखता अनजानापण्डित की आज्ञा ठुकराकर, सकल स्वर्ग पर धूल उड़ाकर<br>जब भी यहाँ ठहरने आता एक प्रश्न उठता है मन मेंअगर आदमी ने न भोग का पूजन-पात्र जुठारा कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवाड़ा होता।<br>प्यार अगर...<br><br>
जाने कैसा अजब शहर यह<br>कैसा अजब मुसाफ़िरख़ाना<br>भीतर से लगता पहचाना<br>बाहर से दिखता अनजाना<br>जब भी यहाँ ठहरने आता एक प्रश्न उठता है मन में<br>कैसा होता विश्व कहीं यदि कोई नहीं किवाड़ा होता।<br>प्यार अगर...<br><br> हर घर-आँगन रंग मंच है<br>औ’ हर एक साँस कठपुतली<br>प्यार सिर्फ़ वह डोर कि जिस पर<br>नाचे बादल, नाचे बिजली,<br>तुम चाहे विश्वास न लाओ लेकिन मैं तो यही कहूँगा<br>प्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता।<br>प्यार अगर...<br><br>
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