भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आदमी / कुँअर बेचैन

16 bytes added, 05:06, 1 जुलाई 2013
|रचनाकार=कुँअर बेचैन
}}
{{KKCatGhazal}}<poem>
तन-मन-प्रान, मिटे सबके गुमान
 
एक जलते मकान के समान हुआ आदमी
छिन गये बान, गिरी हाथ से कमान
 
एक टूटती कृपान का बयान हुआ आदमी
भोर में थकान, फिर शोर में थकान
पोर-पोर में थकान पे थकान हुआ आदमी
दिन की उठान में था, उड़ता विमान
हर शाम किसी चोट का निशान हुआ आदमी।
Delete, Mover, Protect, Reupload, Uploader, प्रबंधक
35,136
edits