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|रचनाकार=शहबाज़ 'नदीम' ज़ियाई
}}
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नहीं ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है दिल हमारा बुझ गया है
मसाइल के सबब शानों पे रौशन था जो चेहरा बुझ गया है
ये मंज़र देख कर साकित हुई हैं यक-ब-यक सय्यार आँखें
कि शब ढलने से पहले रात का धुंदला सितारा बुझ गया है
जो मुझ में राज़ की सूरत था पोशीदा अज़ल से ही यक़ीनन
तअज्जुब है धुआँ होने से पहले शरारा बुझ गया है
रग ओ पै में लहू भी मंुजमिद सा हो गया है क्या करें हम
जो रौशन था हमारे दिल में आख़िर अब वो शोला बुझ गया है
मुसल्लत है हिसार-ए-ज़ेहन पर तारीकी-ए-शब चार जानिब
जो ताबिंदा था मिस्ल-ए-मेहर-ए-नौ अब वो सरापा बुझ गया है
कोई अहल-ए-नज़र आए तो समझाए कि ये है माजरा क्या
हुई है राख बीनाई मिरी या फिर नज़ारा बुझ गया है
कहाँ तक हम लहू से अपनी आँखों का रखें रौशन बताओ
ये सच है ऐ ‘नदीम’ अब शोला-ए-शम्मा-ए-तमन्ना बुझ गया है
</poem>
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|रचनाकार=शहबाज़ 'नदीम' ज़ियाई
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नहीं ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है दिल हमारा बुझ गया है
मसाइल के सबब शानों पे रौशन था जो चेहरा बुझ गया है
ये मंज़र देख कर साकित हुई हैं यक-ब-यक सय्यार आँखें
कि शब ढलने से पहले रात का धुंदला सितारा बुझ गया है
जो मुझ में राज़ की सूरत था पोशीदा अज़ल से ही यक़ीनन
तअज्जुब है धुआँ होने से पहले शरारा बुझ गया है
रग ओ पै में लहू भी मंुजमिद सा हो गया है क्या करें हम
जो रौशन था हमारे दिल में आख़िर अब वो शोला बुझ गया है
मुसल्लत है हिसार-ए-ज़ेहन पर तारीकी-ए-शब चार जानिब
जो ताबिंदा था मिस्ल-ए-मेहर-ए-नौ अब वो सरापा बुझ गया है
कोई अहल-ए-नज़र आए तो समझाए कि ये है माजरा क्या
हुई है राख बीनाई मिरी या फिर नज़ारा बुझ गया है
कहाँ तक हम लहू से अपनी आँखों का रखें रौशन बताओ
ये सच है ऐ ‘नदीम’ अब शोला-ए-शम्मा-ए-तमन्ना बुझ गया है
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