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|रचनाकार=शहबाज़ 'नदीम' ज़ियाई
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उम्र की ढाल से हर लम्हा फिसलता हुआ मैं
अपनी ही ज़ात की तारीख़ बदलता हुआ मैं

ख़्वाब बन कर मिरी आँखों में उतरता हुआ तू
तिफ़्ल-ए-मासूम की मानिंद बहलता हुआ मैं

दर-ब-दर रहता हूँ हर लम्हा तलब में तेरी
जुगनुओं की तरह बुझता हुआ जलता हुआ मैं

तीरगी ख़ुद में सिमटने के अमल में मसरूफ़
नूर बन कर किसी मंज़र से निकलता हुआ मैं

ये मिरा ज़ौक़-ए-तलब ज़ेहन में मंज़िल को बसाए
रास्ता पैरों से बाँधे हुए चलता हुआ मैं

तू मिरे सीने में मौजूद है धड़कन की तरह
और तिरी ज़ात में नासूर सा पलता हुआ मैं

दाद के शोर में वो गुम है मगर ऐ ‘शहबाज़’
वक़्त-ए-तख़लीक़-ए-सुख़न ख़ून उगलता हुआ मैं
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