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|रचनाकार=शेर सिंह नाज़ 'देहलवी'
}}
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बातों में ढूँढते हैं वो पहलू मलाल का
मतलब ये है कि ज़िक्र न आए विसाल का
क्या ज़िक्र उन से कीजिए दिल के मलाल का
है ख़ामुशी जवाब मिरे हर सवाल का
ता उम्र फिर न तालिब-ए-जलवा हुए कलीम
देखा जो एक बार करिश्मा जमाल का
रूख़ पर पड़ी हुई है नक़ाब-ए-शुआ-ए-हुस्न
मौक़ा नज़र को ख़ाक मिले देख भाल का
हम ना मुराद ए इश्क़ वो हिज्राँ नसीब हैं
देखा न हम ने मुँह कभी शाम ए विसाल का
बूद ओ न बूद कहते हैं अहल-ए-जहाँ जिसे
अदना सा शोबदा है तिलिस्म-ए-ख़याल का
</poem>
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|रचनाकार=शेर सिंह नाज़ 'देहलवी'
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बातों में ढूँढते हैं वो पहलू मलाल का
मतलब ये है कि ज़िक्र न आए विसाल का
क्या ज़िक्र उन से कीजिए दिल के मलाल का
है ख़ामुशी जवाब मिरे हर सवाल का
ता उम्र फिर न तालिब-ए-जलवा हुए कलीम
देखा जो एक बार करिश्मा जमाल का
रूख़ पर पड़ी हुई है नक़ाब-ए-शुआ-ए-हुस्न
मौक़ा नज़र को ख़ाक मिले देख भाल का
हम ना मुराद ए इश्क़ वो हिज्राँ नसीब हैं
देखा न हम ने मुँह कभी शाम ए विसाल का
बूद ओ न बूद कहते हैं अहल-ए-जहाँ जिसे
अदना सा शोबदा है तिलिस्म-ए-ख़याल का
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