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|रचनाकार=मोहम्मद रफ़ी 'सौदा'
}}
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या रब कहीं से गर्मी-ए-बाज़ार भेज दे
दिल बेचता हूँ कोई ख़रीदार भेज दे,
अपनी बिसात में तो यही दिल है मेरी जाँ
लेता नहीं तो क्या करूँ ऐ यार भेज दे
दावा जो बरशिगाल को आँखों से है मेरी
ऐसा कोई जो अब्र-ए-गुहर-बार भेज दे
देते हैं अक़्द-ए-हुस्न में आशिक़ उरूस-ए-जाँ
आता नहीं जो आप तो तलवार भेज दे
‘सौदा’ से ग़म-गुसार का था दिल ये तीं लिया
उस के इवज़ भला कोई ग़म-ख़्वार भेज दे
</poem>
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या रब कहीं से गर्मी-ए-बाज़ार भेज दे
दिल बेचता हूँ कोई ख़रीदार भेज दे,
अपनी बिसात में तो यही दिल है मेरी जाँ
लेता नहीं तो क्या करूँ ऐ यार भेज दे
दावा जो बरशिगाल को आँखों से है मेरी
ऐसा कोई जो अब्र-ए-गुहर-बार भेज दे
देते हैं अक़्द-ए-हुस्न में आशिक़ उरूस-ए-जाँ
आता नहीं जो आप तो तलवार भेज दे
‘सौदा’ से ग़म-गुसार का था दिल ये तीं लिया
उस के इवज़ भला कोई ग़म-ख़्वार भेज दे
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