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|रचनाकार=मोहम्मद रफ़ी 'सौदा'
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बरहमन बुत-कदे के शैख़ बैतुल्लाह के सदक़े
कहें हैं जिस को ‘सौदा’ वो दिल-ए-आगाह के सदक़े

जता दें जिस जगह हम क़द्र अपनी ना-तवानी की
अगर कोहसार वाँ होवे तो जावे काह के सदक़े

न दे तकलीफ़ जलने की किसू के दिल को मेरे पर
असर से दूर रहती हैं मैं अपनी आह के सदक़े

अजाइब शुग़्ल में थे रात तुम ऐ शैख़ रहमत है
मैं इस रीश-ए-बुलंद और दामन-ए-कोताह के सदक़े

नहीं बे-वजह कूचे से तेरे उठना बगूले का
हमारी ख़ाक भी जाती है तेरी राह के सदक़े

कभू वो शब भी ऐ परवाना हक़ बाहम दिखावेगा
तू बल बल शम्मा पर जावे मैं हूँ उस माह के सदक़े

दिखाती है तुझे किस तरह ‘सौदा’ की नज़रों में
जो हो इंसाफ़ तो जावे तू उस की चाह के सदक़े
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