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|रचनाकार=मोहम्मद रफ़ी 'सौदा'
}}
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<poem>
नासेह को जेब सीने से फु़र्सत कभू न हो
दिल यार से फटे तो किसी से रफ़ू न हो
इस दिल को दे के लूँ दो जहाँ ये कभू न हो
सौदा तो होवे तब ये कि जब उस में तू न हो
आईना-ए-वजूद अदम में अगर तेरा
वो दरमियाँ न हो तो कहीं हम को रू न हो
झगड़ा तो हुस्न ओ इश्क़ का चुकता है पल के बीच
गर महकमे में क़ाज़ी के तू रू-ब-रू न हो
क़तरे की खुल गई है गिरह वरना ऐ नसीम
शोर-ए-दिमाग़ मुर्ग़-ए-चमन गुल की बू न हो
गुज़रे सो गुज़रे अहल-ए-ज़मीं ऊपर ऐ फ़लक
आइंदा याँ तलक तो कोई ख़ूब-रू न हो
दिल ले के तुझ से बर्क़ के शोले को दीजिए
पर है ये डर कि उस की भी ऐसी ही ख़ू न हो
गुल की न तुख़्म मुर्ग़-ए-चमन कर सके तलाश
हम ख़ाम-फ़ितरतों से तेरी जुस्तुजू न हो
‘सौदा’ बदल के क़ाफ़िया तू इस ग़ज़ल को कह
ऐ बे-अदब तू दर्द से बस दू-ब-दू न हो
</poem>
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नासेह को जेब सीने से फु़र्सत कभू न हो
दिल यार से फटे तो किसी से रफ़ू न हो
इस दिल को दे के लूँ दो जहाँ ये कभू न हो
सौदा तो होवे तब ये कि जब उस में तू न हो
आईना-ए-वजूद अदम में अगर तेरा
वो दरमियाँ न हो तो कहीं हम को रू न हो
झगड़ा तो हुस्न ओ इश्क़ का चुकता है पल के बीच
गर महकमे में क़ाज़ी के तू रू-ब-रू न हो
क़तरे की खुल गई है गिरह वरना ऐ नसीम
शोर-ए-दिमाग़ मुर्ग़-ए-चमन गुल की बू न हो
गुज़रे सो गुज़रे अहल-ए-ज़मीं ऊपर ऐ फ़लक
आइंदा याँ तलक तो कोई ख़ूब-रू न हो
दिल ले के तुझ से बर्क़ के शोले को दीजिए
पर है ये डर कि उस की भी ऐसी ही ख़ू न हो
गुल की न तुख़्म मुर्ग़-ए-चमन कर सके तलाश
हम ख़ाम-फ़ितरतों से तेरी जुस्तुजू न हो
‘सौदा’ बदल के क़ाफ़िया तू इस ग़ज़ल को कह
ऐ बे-अदब तू दर्द से बस दू-ब-दू न हो
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