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|रचनाकार='महशर' इनायती
}}
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लब पे इक नाम हमेशा की तरह
और क्या काम हमेशा की तरह
दिन अगर कोई गुज़ारे भी तो क्या
फिर वही शाम हमेशा की तरह
देख कर उन को मेरे चेहरे का रंग
बर-सर-ए-आम हमेशा की तरह
कूचा-गर्दों पे ही पाबंदी है
जलवा-ए-बाम हमेशा की तरह
दिल वही शहर-ए-तमन्ना ब-किनार
और ना-काम हमेशा की तरह
हाल क्या अपना बताए ‘महशर’
वक़्फ़-ए-आलाम हमेशा की तरह
</poem>
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|रचनाकार='महशर' इनायती
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लब पे इक नाम हमेशा की तरह
और क्या काम हमेशा की तरह
दिन अगर कोई गुज़ारे भी तो क्या
फिर वही शाम हमेशा की तरह
देख कर उन को मेरे चेहरे का रंग
बर-सर-ए-आम हमेशा की तरह
कूचा-गर्दों पे ही पाबंदी है
जलवा-ए-बाम हमेशा की तरह
दिल वही शहर-ए-तमन्ना ब-किनार
और ना-काम हमेशा की तरह
हाल क्या अपना बताए ‘महशर’
वक़्फ़-ए-आलाम हमेशा की तरह
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