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|रचनाकार='महशर' इनायती
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मैं तो ज़िंदगी चाहूँ ज़िंदगी ख़ुशी चाहे
उन की बात रहने दो उन का जो भी जी चाहे

राज़ ये गुलिस्ताँ का हल न हो सका अब तक
ख़ार क्यूँ लहू चाहे ग़ुंचा क्यूँ हँसी चाहे

सब नुकूश चेहरे के आप को दिखा देगा
ख़ुद ही देखिए दिल को आईना यही चाहे

ज़ोर ही हवाओं का फै़सला करे शायद
दिल सलीक़गी चाहे ज़ुल्फ़ बरहमी चाहे

बोलती कहानी है चाँद और सूरज की
मेरी रात में आए जो भी रौशनी चाहे

सुब्ह को तमन्ना कुछ शाम को तमन्ना कुछ
कौन शख़्स है ‘महशर’ कैसी ज़िंदगी चाहे
</poem>
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