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|रचनाकार='महशर' इनायती
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ये जान कर के फूल नहीं इख़्तियार के
काँटे चुने हैं मैं ने चमन में बहार के

हिम्मत ब-ख़ैर देख रहा हूँ गुज़ार के
कुछ लम्हे और वो भी तेरे इंतिज़ार के

आवाज़ आई कान में शायद उन्हीं की है
अब क्या हो लाओ देखूँ तो ख़ुद को पुकार के

मजनून का सा ख़्वाब के गुलशन पे हक़ मिले
मजज़ूब की सी बात के दिन हैं बहार के

गुज़री तो है तुम्हारी जुदाई की एक रात
ज़िंदा तो रह गया हूँ क़यामत गुज़ार के

‘महशर’ ज़माना है के रवाँ है मगर यहाँ
बंदे बने हुए हैं सुकून ओ क़रार के
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